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उत्तराखंड के तीन जिले आपदा के ‘हॉटस्पॉट’, बजा रहे खतरे की घंटी, अतीत में मच चुकी है तबाही

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हिमालयी राज्य उत्तराखंड मौजूदा समय में कई आपदाओं के मुहाने पर खड़ा है. इनमें 3 जिले बेहद संवेदनशील हैं. देहरादून से नवील उनियाल की रिपोर्ट

देहरादून: उत्तराखंड में आपदाओं का हॉटस्पॉट बने तीन जिले आपदा प्रबंधन विभाग के लिए भी चिंता का सबब बने हुए हैं. सर्वे में ये बात साफ हुई है कि उत्तरकाशी, चमोली और पिथौरागढ़ जिला आपदा को लेकर सबसे ज्यादा संवेदनशील हैं. लिहाजा, मानसून के दौरान इन्हीं जिलों पर सबसे ज्यादा फोकस करते हुए एक विस्तृत प्लान तैयार किया जा रहा है. जानिए ये 3 जिले क्यों हैं आपदा का हॉटस्पॉट.

उत्तराखंड में आपदाओं का इतिहास जितना पुराना है, उतना ही चिंताजनक भी. हर साल मानसून के दौरान राज्य के अलग-अलग हिस्सों से बादल फटने, भूस्खलन, फ्लैश फ्लड, भूधंसाव और भूकंप जैसी घटनाओं की खबरें सामने आती रहती हैं. हालांकि, प्रदेश के लगभग सभी जिले किसी न किसी रूप में प्राकृतिक आपदाओं की चपेट में आते रहे हैं, लेकिन तीन जिले ऐसे हैं, जिन्हें सबसे ज्यादा आपदा संवेदनशील (Disaster Prone) माना गया है.

इनमें उत्तरकाशीचमोली और पिथौरागढ़ जिले शामिल हैं. इन जिलों में बीते कई दशकों के दौरान हुई बड़ी आपदाएं इस बात की गवाही देती हैं कि हिमालयी भूगोल और बदलते मौसमीय हालात ने इन क्षेत्रों को बेहद संवेदनशील बना दिया है. आपदा प्रबंधन विभाग की ओर से हाल ही में कराए गए एक सर्वे में भी इन तीन जिलों को सबसे ज्यादा संवेदनशील माना गया है.

सैटेलाइट इमेजरी के जरिए किए गए इस अध्ययन में उन क्षेत्रों को चिन्हित किया गया है, जहां भारी बारिश या प्राकृतिक गतिविधियों के कारण आबादी वाले क्षेत्रों को गंभीर खतरा पैदा हो सकता है. अब इन संवेदनशील इलाकों का ड्रोन सर्वे भी कराया जाएगा. ताकि, आगामी मानसून से पहले संभावित जोखिमों का बारीकी से आकलन किया जा सके.

प्राकृतिक आपदाओं का केंद्र रहा उत्तरकाशी: सीमांत उत्तरकाशी जिला लंबे समय से प्राकृतिक आपदाओं का केंद्र रहा है. यह जिला भूकंप, बादल फटने, फ्लैश फ्लड और भूस्खलन जैसी घटनाओं के लिए बेहद संवेदनशील माना जाता है. साल 1991 में उत्तरकाशी में आया विनाशकारी भूकंप आज भी लोगों के जेहन में ताजा है.

रिक्टर स्केल पर 6.8 तीव्रता वाले इस भूकंप ने पूरे क्षेत्र में भारी तबाही मचाई थी. हजारों मकान क्षतिग्रस्त हो गए थे और सैकड़ों लोगों की मौत हुई थी. पहाड़ी क्षेत्रों में बसे गांवों की स्थिति इतनी भयावह थी कि कई गांव पूरी तरह तबाह हो गए थे. यह भूकंप उत्तराखंड के लिहाज से सबसे बड़ा और भयानक था.

इसके बाद साल 2012 में अस्सी गंगा क्षेत्र में बादल फटने की घटना ने एक बार फिर उत्तरकाशी की संवेदनशीलता को उजागर किया. अचानक आई भीषण बाढ़ में कई गांव तबाह हो गए और दर्जनों लोग या तो मारे गए या लापता हो गए. इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया कि ऊंचाई वाले क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा किस तरह अचानक बड़े खतरे में बदल सकती है.

इतना ही नहीं हर मानसून सीजन में उत्तरकाशी के अलग-अलग क्षेत्रों में भूस्खलन और सड़कें बंद होने की घटनाएं आम हो चुकी हैं. हाल ही में आई धराली आपदा ने भी भारी नुकसान पहुंचाया और कई लोगों की जान चली गई. उत्तरकाशी की भौगोलिक स्थिति भी इसे ज्यादा संवेदनशील बनाती हैं.

यहां ऊंचे पहाड़, कमजोर चट्टानें और लगातार हो रहे भूगर्भीय बदलाव प्राकृतिक आपदाओं की संभावना को बढ़ाते हैं. भारी बारिश के दौरान नदियों का जलस्तर तेजी से बढ़ता है और पहाड़ों से मलबा गिरने की घटनाएं आम हो जाती हैं. यही कारण है कि मानसून के दौरान प्रशासन को लगातार अलर्ट मोड पर रहना पड़ता है.

संवेदनशील जिलों में शामिल चमोली भी शामिल: इसी तरह चमोली जिला भी उत्तराखंड के सबसे संवेदनशील जिलों में शामिल है. यह जिला भूकंप, ग्लेशियर टूटने, भूधंसाव और भूस्खलन जैसी घटनाओं के कारण लंबे समय से चर्चा में रहा है. साल 1999 में चमोली में आए 6.6 तीव्रता के भूकंप ने भारी तबाही मचाई थी. इस आपदा में 100 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी और बड़ी संख्या में भवन क्षतिग्रस्त हुए थे.

इसके बाद साल 2021 में ऋषिगंगा क्षेत्र में ग्लेशियर टूटने की घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था. अचानक आई फ्लैश फ्लड ने ऋषिगंगा और एनटीपीसी की जलविद्युत परियोजनाओं को पूरी तरह तबाह कर दिया था. इस हादसे में 200 से ज्यादा लोग मारे गए या आज तक लापता हैं.

वैज्ञानिकों ने इस घटना को जलवायु परिवर्तन और हिमालयी क्षेत्र में तेजी से बढ़ रहे तापमान से भी जोड़कर देखा. विशेषज्ञों का मानना है कि ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने और अस्थिर होने के कारण इस तरह की घटनाओं का खतरा लगातार बढ़ रहा है. चमोली जिला एक और बड़ी समस्या से जूझ रहा है और वो है भूधंसाव.

साल 2023 में जोशीमठ (अब ज्योतिर्मठ) में सामने आया भूधंसाव संकट आज भी सरकार के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है. ज्योतिर्मठ के कई हिस्सों में जमीन धंसने लगी और मकानों में बड़ी-बड़ी दरारें आ गईं. 800 से ज्यादा घर प्रभावित हुए. जबकि, सैकड़ों परिवारों को विस्थापित करना पड़ा. इस घटना ने पूरे हिमालयी क्षेत्र में अनियोजित निर्माण और भूगर्भीय अस्थिरता को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए.

चमोली जिले में हर साल मानसून के दौरान भूस्खलन और सड़कें बंद होने की घटनाएं सामने आती रहती हैं. बदरीनाथ हाईवे समेत कई प्रमुख सड़कें कई-कई दिनों तक बाधित रहती हैं. इससे न केवल स्थानीय लोगों को परेशानी होती है. बल्कि, चारधाम यात्रा भी प्रभावित होती है. ऊंचाई वाले क्षेत्रों में लगातार कटाव और ढलानों का कमजोर होना आने वाले समय में और बड़ी चुनौतियों का संकेत माना जा रहा है.

आपदाओं के लिहाज से पिथौरागढ़ भी संवेदनशील: पिथौरागढ़ जिला भी आपदाओं के लिहाज से कम संवेदनशील नहीं है. नेपाल और चीन की सीमा से लगा यह जिला भूकंप, बाढ़ और भूस्खलन की दृष्टि से बेहद संवेदनशील माना जाता है. यहां काली नदी का जलस्तर बढ़ने पर सीमांत क्षेत्रों में भारी खतरा पैदा हो जाता है. साल 2020 में काली नदी में आई बाढ़ के कारण नेपाल बॉर्डर से लगे कई क्षेत्रों में भारी तबाही हुई थी. नदी किनारे बसे गांवों और संपर्क मार्गों को गंभीर नुकसान पहुंचा था.

साल 2016 में मुनस्यारी क्षेत्र में बादल फटने की घटना ने भी भारी तबाही मचाई थी. अचानक आई बाढ़ में कई गांव प्रभावित हुए और लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाना पड़ा. इसके अलावा साल 2024 में बंगापानी क्षेत्र में आई फ्लैश फ्लड के कारण 10 से ज्यादा लोगों की मौत हुई. जबकि, कई लोग लापता हो गए थे. यह घटना एक बार फिर इस बात का संकेत थी कि सीमांत क्षेत्रों में आपदा का खतरा लगातार बढ़ रहा है.

पिथौरागढ़ में मिलम ग्लेशियर क्षेत्र भी चिंता का कारण बना हुआ है. ग्लेशियरों में लगातार हो रहे बदलाव और बर्फ के खिसकने की घटनाओं के कारण जोहार घाटी के कई गांवों और ट्रेकिंग रूट्स पर खतरा बढ़ गया है. मानसून के दौरान यहां लगातार भूस्खलन की घटनाएं सामने आती हैं और कई मुख्य सड़कें घंटों या दिनों तक बंद रहती हैं.

विशेषज्ञों के अनुसार उत्तराखंड के इन तीन जिलों की संवेदनशीलता के पीछे सबसे बड़ी वजह हिमालय का भूगर्भीय ढांचा है. भूवैज्ञानिकों ने हिमालय को तीन प्रमुख टेक्टॉनिक जोन में विभाजित किया है. इसमें शिवालिक, लेसर हिमालय और केंद्रीय हिमालय. इन क्षेत्रों को अलग-अलग फॉल्ट लाइन और थ्रस्ट जोन विभाजित करते हैं. इनमें मेन फ्रंटल थ्रस्ट (MFT), मेन बाउंड्री थ्रस्ट (MBT) और मेन सेंट्रल थ्रस्ट (MCT) प्रमुख हैं.

इनमें सबसे ज्यादा सक्रिय मेन सेंट्रल थ्रस्ट यानी एमसीटी (MCT) माना जाता है. वैज्ञानिकों के अनुसार इस क्षेत्र में धरती के भीतर सबसे ज्यादा ऊर्जा रिलीज होती है. यही कारण है कि यहां भूकंप और भूगर्भीय हलचल की घटनाएं ज्यादा होती हैं. उत्तरकाशी, चमोली और पिथौरागढ़ जिले इसी एमसीटी जोन में आते हैं. इस वजह से यहां धरती की सतह पर लगातार बदलाव देखने को मिलते हैं.

हिमालय का यह हिस्सा बेहद संवेदनशील है. जिन क्षेत्रों से मेन सेंट्रल थ्रस्ट गुजर रही है, वहां आपदा का खतरा ज्यादा बना रहता है. इन क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा, कमजोर चट्टानें और लगातार भूगर्भीय गतिविधियां आपदाओं की आशंका को और बढ़ा देती हैं. इसलिए इन इलाकों के लिए अलग तरह की आपदा प्रबंधन रणनीति की जरूरत है.“- एसपीएस बिष्ट, भू वैज्ञानिक

बारिश का पैटर्न भी बदल रहा: दरअसल, उत्तराखंड में मानसून सीजन 15 जून से 15 सितंबर तक माना जाता है, लेकिन बदलते मौसमीय चक्र के कारण अब बारिश का पैटर्न भी बदलता हुआ दिखाई दे रहा है. कभी समय से पहले भारी बारिश हो जाती है, तो कभी लंबे समय तक बारिश का दौर बना रहता है.

जलवायु परिवर्तन के कारण बादल फटने जैसी घटनाएं भी तेजी से बढ़ी हैं. पहाड़ी क्षेत्रों में कम समय में अत्यधिक बारिश होने से अचानक बाढ़ और मलबा आने की घटनाएं बढ़ रही हैं. इसी खतरे को देखते हुए राज्य का आपदा प्रबंधन विभाग मानसून से पहले तैयारियों में जुट गया है.

संवेदनशील क्षेत्रों को लेकर संबंधित जिलाधिकारियों के साथ चर्चा की जा चुकी है और विशेष कार्ययोजना तैयार की जा रही है. ड्रोन सर्वे के जरिए संवेदनशील इलाकों का विस्तृत अध्ययन किया जाएगा. ताकि, संभावित खतरे वाले क्षेत्रों में समय रहते सुरक्षा उपाय किए जा सकें.“- विनोद कुमार सुमन, सचिव, उत्तराखंड आपदा प्रबंधन विभाग

विशेषज्ञों का मानना है कि केवल राहत और बचाव कार्यों से समस्या का समाधान नहीं होगा. इसके लिए दीर्घकालिक योजना बनाने की जरूरत है. अनियोजित निर्माण, नदियों के किनारे अतिक्रमण, पहाड़ों की अंधाधुंध कटाई और बिना वैज्ञानिक अध्ययन के विकास परियोजनाएं इन क्षेत्रों को और ज्यादा जोखिम में डाल रही हैं. ऐसे में संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण गतिविधियों पर नियंत्रण, बेहतर ड्रेनेज सिस्टम, समय पर चेतावनी प्रणाली और स्थानीय लोगों को आपदा प्रबंधन का प्रशिक्षण देना बेहद जरूरी हो गया है.

उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में बढ़ती आपदाएं केवल प्राकृतिक नहीं बल्कि मानवीय गतिविधियों से भी जुड़ी हुई हैं. लगातार बढ़ते तापमान, ग्लेशियरों के पिघलने और अनियंत्रित विकास ने हिमालय की संवेदनशीलता को और बढ़ा दिया है. ऐसे में आने वाले समय में इन क्षेत्रों के लिए वैज्ञानिक और संतुलित विकास मॉडल अपनाना सबसे बड़ी आवश्यकता होगी.

फिलहाल, राज्य सरकार और आपदा प्रबंधन विभाग आगामी मानसून को देखते हुए सतर्क नजर आ रहे हैं, लेकिन असली चुनौती इन संवेदनशील जिलों में रहने वाले लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है. उत्तरकाशी, चमोली और पिथौरागढ़ जैसे जिलों में हर साल सामने आने वाली आपदाएं यह साफ संकेत दे रही हैं कि यदि समय रहते ठोस और वैज्ञानिक कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में और बड़ी त्रासदियों का सामना करना पड़ सकता है.

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