उत्तराखंड में हजारों पेड़ों से खतरे में पड़ी जंगलों की सुरक्षा! अब हरे वनों पर चलाई जाएंगी आरियां, जानिए क्यों?

उत्तराखंड में हजारों पेड़ों की शामत आने वाली है. बकायदा अभी तक 70 हजार पेड़ चिह्नित किए जा चुके हैं.देहरादून से नवीन उनियाल की रिपोर्ट
देहरादून: उत्तराखंड में हजारों पेड़ों को कटवाने के लिए इन दिनों खुद वन विभाग कसरत में जुटा है. स्थिति ये है कि अलग-अलग डिवीजन में पेड़ों का चिह्नीकरण या तो हो चुका है या फिर तेजी से इस पर काम चल रहा है. खास बात ये है कि प्रदेशभर में करीब एक लाख से ज्यादा पेड़ों को कटवाने की जरूरत महसूस हो रही है, जिसमें से 70 हजार पेड़ तो चिह्नित भी हो चुके हैं.
उत्तराखंड के हरे-भरे जंगल एक बार फिर बड़े बदलाव की दहलीज पर खड़े हैं. प्रदेशभर में हजारों पेड़ों को काटने की तैयारी चल रही है. सबसे बड़ी बात ये है कि यह काम किसी सड़क, बांध या विकास परियोजना के लिए नहीं, बल्कि खुद जंगलों को बचाने के नाम पर किया जा रहा है.
वन विभाग इन दिनों प्रदेश के अलग-अलग वन प्रभागों में फायर लाइन तैयार करने के लिए बड़े पैमाने पर पेड़ों का चिह्नीकरण कर रहा है. हालात ये हैं कि प्रदेशभर में करीब एक लाख से ज्यादा पेड़ों को हटाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है, जिनमें से करीब 70 हजार पेड़ों का चिह्नीकरण किया जा चुका है.
यह पूरा मामला अब पर्यावरण संरक्षण और वन सुरक्षा के बीच संतुलन की बड़ी बहस बनता जा रहा है. एक ओर वन विभाग इसे जंगलों को वनाग्नि से बचाने के लिए जरूरी कदम बता रहा है, तो वहीं दूसरी ओर पर्यावरणविद् सवाल उठा रहे हैं कि क्या हरे-भरे पेड़ों की कटाई ही एकमात्र विकल्प है.
दरअसल, उत्तराखंड के जंगल हर साल भीषण वनाग्नि की चपेट में आते हैं. गर्मियों के मौसम में सूखी घास, चीड़ की पत्तियां और बढ़ता तापमान जंगलों को आग के लिए बेहद संवेदनशील बना देता है. पिछले कुछ सालों में राज्य में वनाग्नि की घटनाएं लगातार बढ़ी हैं. इन्हीं घटनाओं ने वन विभाग को पुराने सिस्टम यानी फायर लाइन व्यवस्था को फिर से मजबूत करने के लिए मजबूर किया है.
धीरे-धीरे फायर लाइन का अस्तित्व लगभग खत्म हो गया. ऐसी स्थिति में जब जंगलों में आग लगती थी, तो उसे रोकने के लिए कोई प्राकृतिक अवरोध नहीं बचता था. नतीजा ये हुआ कि आग तेजी से बड़े क्षेत्रों में फैलने लगी और वन विभाग को उसे नियंत्रित करने में भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ा.
वनाग्नि की बढ़ती घटनाओं और उसके गंभीर प्रभावों को देखते हुए उत्तराखंड सरकार ने यह मामला सुप्रीम कोर्ट में उठाया. सरकार ने दलील दी कि फायर लाइन के रखरखाव के बिना जंगलों को आग से बचाना बेहद मुश्किल हो गया है. इसके बाद साल 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने आदेश में राहत देते हुए फायर लाइन क्षेत्र में आवश्यक पेड़ों की कटाई की अनुमति दे दी.
सुप्रीम कोर्ट से राहत मिलने के बाद वन विभाग ने राज्यभर में व्यापक सर्वे शुरू किया. अलग-अलग वन प्रभागों में यह देखा गया कि फायर लाइन क्षेत्रों में कितने पेड़ आ चुके हैं और किन क्षेत्रों में तत्काल सफाई की जरूरत है? सर्वे के बाद अब पेड़ों की कटाई की प्रक्रिया को अंतिम रूप दिया जा रहा है.
वन विभाग का दावा है कि यह कदम जंगलों को बचाने के लिए उठाया जा रहा है, क्योंकि यदि फायर लाइन साफ नहीं की गई तो आने वाले सालों में वनाग्नि और ज्यादा भयावह रूप ले सकती है. विभाग के मुताबिक, प्राथमिकता उन क्षेत्रों को दी जा रही है, जो वनाग्नि की दृष्टि से सबसे ज्यादा संवेदनशील हैं.
सूबे के कई प्रमुख वन प्रभाग इस अभियान के दायरे में हैं. हल्द्वानी, नैनीताल और रामनगर डिवीजन में ही करीबन 40 हजार पेड़ों को हटाने की प्रक्रिया चल रही है. इसी तरह भागीरथी सर्कल के नरेंद्र नगर और उत्तरकाशी डिवीजन में भी 20 हजार से ज्यादा पेड़ों को चिह्नित किया गया है. इसके अलावा आसपास के कई अन्य डिवीजनों में भी हजारों पेड़ इस सूची में शामिल हैं.
“वनाग्नि रोकने के लिए वन विभाग के प्रयासों की सराहना की जा सकती है, लेकिन विभाग को यह स्पष्ट करना होगा कि जिन पेड़ों को काटने के लिए चिह्नि किया गया है, उनकी पहचान किस आधार पर की गई. क्या वास्तव में सभी चिह्नित पेड़ फायर लाइन में बाधा बन रहे थे या फिर प्रक्रिया में कहीं लापरवाही हुई है? क्या पेड़ों की कटाई अंतिम विकल्प था या इसके अलावा कोई वैकल्पिक तरीका अपनाया जा सकता था?“- अनूप नौटियाल, पर्यावरण प्रेमी
फायर लाइन को बनाए रखने के लिए केवल पेड़ों की कटाई पर्याप्त नहीं है. इसके साथ ही जंगलों में सूखी पत्तियों की नियमित सफाई, स्थानीय समुदायों की भागीदारी, आधुनिक तकनीक का उपयोग और वन कर्मियों की संख्या बढ़ाना भी जरूरी है. हालांकि, वन महकमा ये सभी काम अपने स्तर पर किए जाने का दावा कर रहा है.
दरअसल, उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं हैं, बल्कि यहां की जलवायु, जलस्रोत, पर्यटन और स्थानीय लोगों की आजीविका का आधार भी हैं. ऐसे में हजारों पेड़ों की कटाई का निर्णय स्वाभाविक रूप से चिंता पैदा करता है. जबकि, पूरी दुनिया इस वक्त ग्लोबल वार्मिंग की समस्या से जूझ रहा है. साथ ही पर्यावरण भी असंतुलित हो रहा है.

