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PM मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट ‘सैन्य धाम’ की लागत हुए दोगुनी, 55 करोड़ था बजट, 92 करोड़ हुए खर्च, 12 करोड़ और मांगे

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पीएम मोदी का ड्रीम प्रोजेक्ट सैन्य धाम महंगा साबित हो रहा है. प्रोजेक्ट की कीमत अनुमानित लागत के काफी ज्यादा चली गई है.

देहरादून: उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में बड़े दावों के साथ शुरू किया गया सैन्य धाम प्रोजेक्ट अब भारी भरकम बजट खर्च के लिए चर्चाओं में है. हालात ये है कि करोड़ों खर्च करने के बाद भी फिर करोड़ों का बजट मांगा जा रहा है. अब तक सैन्य धाम पर निर्माण एजेंसी बजट खर्च में 100 करोड़ के करीब पहुंच गई है, इसके बावजूद सैन्यधाम के पूरी तरह से तैयार होने की जल्द कोई उम्मीद नहीं है. इसी पर ईटीवी भारत की स्पेशल रिपोर्ट…

अनुमानित लागत 55 करोड़ रुपए थी: उत्तराखंड सरकार का महत्वाकांक्षी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट्स में शामिल सैन्यधाम एक बार फिर चर्चा में है. वजह है लगातार बढ़ता बजट, निर्माण में हो रही देरी और परियोजना के पूरा होने को लेकर बने सवाल. जिस सैन्यधाम को कभी लगभग 55 करोड़ रुपये की लागत से तैयार करने का अनुमान लगाया गया था, उस पर अब तक करीब 92 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं. इसके बावजूद निर्माण एजेंसी ने अतिरिक्त 12 करोड़ रुपये की मांग कर दी है. यदि यह राशि भी स्वीकृत हो जाती है तो सैन्यधाम की लागत 104 करोड़ रुपये से अधिक पहुंच जाएगी.

104 करोड़ रुपए तक पहुंची बजट: सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या 104 करोड़ रुपए खर्च होने के बाद भी सैन्यधाम पूरी तरह तैयार हो जाएगा? जवाब है नहीं. क्योंकि इसके भीतर प्रस्तावित संग्रहालय, प्रदर्शनी भवनों और अन्य व्यवस्थाओं के लिए अलग से बजट की आवश्यकता होगी. ऐसे में यह परियोजना अब अपने बढ़ते खर्च और लंबी समय सीमा को लेकर सवालों के घेरे में आ गई है.

बड़े सपनों के साथ हुई थी शुरुआत: सैन्यधाम का विचार उत्तराखंड के उन शहीद सैनिकों की स्मृति को सम्मान देने के लिए सामने आया था, जिन्होंने देश की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया. साल 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सैन्यधाम को उत्तराखंड का पांचवां धाम बताते हुए इसकी घोषणा की थी. इसके बाद 15 दिसंबर 2021 को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने देहरादून के गुनियाल गांव में इसका शिलान्यास किया.

करीब चार हेक्टेयर क्षेत्र में बन रहे इस सैन्य धाम के लिए उत्तराखंड के 1734 शहीद सैनिकों के घरों से मिट्टी एकत्र की गई थी. इसे सैनिक सम्मान और राज्य की सैन्य परंपरा का प्रतीक बताया गया, लेकिन जिस परियोजना को राष्ट्रीय महत्व का प्रतीक बनना था, वह शुरू से ही विवादों में घिरती चली गई.

55 करोड़ से 104 करोड़ तक पहुंचा खर्च: किसी भी सरकारी परियोजना की शुरुआत से पहले उसकी विस्तृत परियोजना रिपोर्ट यानी डीपीआर तैयार की जाती है. इसी आधार पर लागत का अनुमान लगाया जाता है और बजट स्वीकृत किया जाता है. सैन्य धाम के मामले में भी यही प्रक्रिया अपनाई गई थी. प्रारंभिक आकलन के अनुसार सैन्य धाम को लगभग 55 करोड़ रुपये में तैयार होना था, लेकिन निर्माण शुरू होने के बाद लगातार नए कार्य जोड़े जाते गए. परियोजना में संशोधन हुए, नई आवश्यकताएं सामने आईं और अतिरिक्त बजट की मांग बढ़ती गई.

स्थिति यह है कि अब तक इस परियोजना पर लगभग 92 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं. इसके बावजूद निर्माण एजेंसी पेयजल विभाग ने हाल ही में पहले 8 करोड़ और बाद में 4 करोड़ रुपये की अतिरिक्त मांग रख दी. यानी कुल 12 करोड़ रुपये और मांगे गए हैं. सरकारी सूत्रों के अनुसार इनमें से 4 करोड़ रुपये की स्वीकृति मिल भी चुकी है, जबकि शेष राशि पर विचार चल रहा है. यदि पूरी मांग स्वीकार कर ली जाती है तो सैन्य धाम की कुल लागत 104 करोड़ रुपये के पार पहुंच जाएगी.

आखिर किस काम के लिए मांगा गया अतिरिक्त बजट?: निर्माण एजेंसी ने अतिरिक्त बजट की आवश्यकता कुछ ऐसे कार्यों के लिए बताई गई है जो मूल डीपीआर में शामिल नहीं थे या बाद में जोड़े गए. इनमें प्रमुख रूप से

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