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उत्तराखंड में ​पासपोर्ट सेवा में बढ़ाया मान, अब दिल्ली में संभाली महिला-बाल विकास की कमान

उत्तराखंड में ​पासपोर्ट सेवा में बढ़ाया मान, अब दिल्ली में संभाली महिला-बाल विकास की कमान

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पहाड़ की दूरी की चकनाचूर, ‘पांडेय मॉडल’ से पासपोर्ट सेवा हुई घर-घर को मंजूर

दून प्लस ब्यूरो/मनीष चंद्र भट्ट

देहरादून। उत्तराखंड में पासपोर्ट सेवाओं की सूरत बदलने वाले कुशल प्रशासक और क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी (RPO) रहे विजय शंकर पांडेय अब राष्ट्रीय स्तर पर अपनी नई सेवाएं दे रहे हैं। भारत सरकार ने केंद्रीय सचिवालय सेवा संवर्ग के वरिष्ठ अधिकारी विजय शंकर पांडेय की प्रशासनिक दक्षता और बेहतरीन ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए उन्हें पदोन्नत कर केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, नई दिल्ली में निदेशक (Director) के महत्वपूर्ण पद पर नियुक्त किया है।

​उत्तराखंड में ‘सेवा का नया अध्याय’

​विजय शंकर पांडेय का देहरादून में कार्यकाल किसी स्वर्णिम उपलब्धि से कम नहीं रहा। जब उन्होंने कार्यभार संभाला था, तब पहाड़ी राज्य उत्तराखंड के निवासियों के लिए पासपोर्ट बनवाना एक कठिन और खर्चीली प्रक्रिया थी। लेकिन उन्होंने अपनी दूरदर्शिता से व्यवस्था को पूरी तरह बदल दिया।
उन्होंने दुर्गम क्षेत्रों के लिए मोबाइल वैन सेवा को प्रभावी बनाया। अब चमोली, उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ जैसे सीमांत जिलों के युवाओं को पासपोर्ट के लिए देहरादून की लंबी दूरी तय नहीं करनी पड़ती। विजय शंकर पांडेय ने पासपोर्ट कार्यालय में ‘बिचौलिया संस्कृति’ को भी जड़ से खत्म किया। उन्होंने पूरी प्रक्रिया को इतना पारदर्शी और डिजिटल बनाया कि आम आदमी बिना किसी सिफारिश के अपना काम करवाने में सक्षम हुआ।
श्री पांडेय ने राज्य के पुलिस महानिदेशक और जिला कप्तानों के साथ निरंतर संवाद कर पुलिस सत्यापन (PVR) की समय-सीमा को न्यूनतम स्तर पर पहुँचाया, जिससे आवेदकों को रिकॉर्ड समय में पासपोर्ट मिलने लगे।

​मानवीय दृष्टिकोण के लिए मिली सराहना

​केवल प्रशासनिक सुधार ही नहीं, बल्कि श्री पांडेय को उनके मानवीय दृष्टिकोण के लिए भी जाना जाता है। मेडिकल इमरजेंसी या छात्रों के वीजा संबंधी मामलों में उन्होंने हमेशा व्यक्तिगत रुचि लेकर फाइलों का त्वरित निस्तारण सुनिश्चित किया। उनके मिलनसार स्वभाव और शिकायतों को सुनने की तत्परता ने पासपोर्ट कार्यालय को एक ‘फ्रेंडली सरकारी कार्यालय’ के रूप में स्थापित किया।

​नई जिम्मेदारी: दिल्ली में बड़ी भूमिका

​अब केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय में निदेशक के रूप में वे देश की महिलाओं और बच्चों के कल्याण से जुड़ी योजनाओं के नीति-निर्धारण और कार्यान्वयन में अहम भूमिका निभाएंगे। प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तराखंड में जनसेवा का जो मॉडल उन्होंने तैयार किया, उसका लाभ अब राष्ट्रीय स्तर पर मंत्रालय को मिलेगा।

​देहरादून कार्यालय के अधिकारियों और कर्मचारियों ने श्री पांडेय के स्थानांतरण होने पर उन्हें भव्य विदाई देते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की है। उनके स्थानांतरण से उत्तराखंड को एक ऐसे अधिकारी की कमी हमेशा खेलेगी, जिसने सरकारी तंत्र को ‘जन-तंत्र’ बनाने की दिशा में काम किया।

आंकड़ों की जुबानी, विजय शंकर पांडेय की कहानी

​जब हम किसी प्रशासनिक अधिकारी की सफलता की बात करते हैं, तो अक्सर भावनाएं हावी रहती हैं, लेकिन वरिष्ठ अधिकारी विजय शंकर पांडेय के मामले में आंकड़े उनकी सफलता की गवाही स्वयं देते हैं। देहरादून कार्यालय में उनके कार्यकाल को “उत्तराखंड पासपोर्ट का स्वर्ण युग” कहना गलत नहीं होगा।

​1. मोबाइल कैंप: ‘पहाड़ का पानी और पासपोर्ट’ अब पहाड़ में ही

​श्री पांडेय ने यह समझा कि पहाड़ की भौगोलिक परिस्थितियां एक बड़ी बाधा हैं। उनके नेतृत्व में आयोजित मोबाइल कैंपों की सफलता के कुछ प्रमुख आंकड़े:

​दूरी की बचत: सीमांत जिलों के लोगों की औसतन 500 से 700 किलोमीटर की यात्रा को उनके घर के पास ही कैंप लगाकर समाप्त किया गया।

​कैंपों की संख्या: उनके कार्यकाल में रिकॉर्ड संख्या में मोबाइल कैंप आयोजित किए गए, जिससे हजारों आवेदकों को लाभ मिला।

​वित्तीय राहत: अनुमान के मुताबिक, इन कैंपों के कारण पहाड़ के युवाओं और बुजुर्गों के यात्रा और ठहरने के खर्च में लाखों रुपये की बचत हुई।

​2. ‘जीरो पेंडेंसी’ का लक्ष्य

​पांडेय जी के आने से पहले फाइलों का अंबार एक बड़ी समस्या थी। उन्होंने एक ऐसी कार्यप्रणाली विकसित की जिसने कार्यालय को ‘फास्ट ट्रैक’ पर ला खड़ा किया:

​डिस्पोजल रेट: फाइलों के निस्तारण की दर में 40% से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई।

​अपॉइंटमेंट स्लॉट: उन्होंने प्रतिदिन के स्लॉट की संख्या बढ़ाई, जिससे ‘वेटिंग पीरियड’ जो हफ़्तों में होता था, वह सिमटकर चंद दिनों का रह गया।

​3. ‘पॉलिसी टू पीपल’ – सुशासन का मॉडल

​उन्होंने केवल दफ्तर नहीं चलाया, बल्कि उसे एक ‘हेल्प डेस्क’ में बदल दिया:

​वीकेंड ड्राइव: विशेष शनिवार सत्रों के माध्यम से पेंडिंग मामलों का निस्तारण किया गया।

​तत्काल सेवा: तत्काल श्रेणी के पासपोर्ट जारी करने की समय सीमा को और अधिक सुधारा गया, जिससे आपातकालीन स्थितियों में लोगों को बड़ी राहत मिली।

​4. पुलिस सत्यापन (PVR) में ‘डिजिटल जंप’

​उत्तराखंड पुलिस के साथ उनके बेहतर समन्वय का परिणाम यह हुआ कि, ​सत्यापन की औसत अवधि, जो पहले 20-25 दिन हुआ करती थी, कई जिलों में घटकर 10 दिन से भी कम रह गई।

​सम्मान का प्रतीक:

इन्ही उपलब्धियों के कारण उन्हें न केवल जनता का प्यार मिला, बल्कि विभाग के भीतर भी एक ‘रिजल्ट ओरिएंटेड’ अधिकारी की पहचान मिली।
वर्ष 2025 में विजय शंकर पांडेय देश भर में सर्वश्रेष्ठ पासपोर्ट अधिकारी बने। देहरादून कार्यालय को पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर यह विशेष मान्यता पुरस्कार मिला। नई दिल्ली में आयोजित क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारियों के सम्मेलन के दौरान, पासपोर्ट सेवा दिवस (24 जून), 2025 के अवसर पर देहरादून के क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी विजय शंकर पांडेय को उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए विशेष मान्यता पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह सम्मान उन्हें विदेश राज्य मंत्री पाबित्रा मार्गेरिटा द्वारा प्रदान किया गया।
विजय शंकर पांडेय को यह सम्मान सालाना 1.5 लाख से अधिक पासपोर्ट जारी करने वाले कार्यालयों की श्रेणी में देश के सर्वश्रेष्ठ पासपोर्ट अधिकारी के रूप में प्रदान किया गया। यह उपलब्धि देहरादून क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय के इतिहास में पहली बार दर्ज हुई है।
उनके नेतृत्व में विभाग ने मोबाइल वैन शिविरों के माध्यम से राज्य के दूरस्थ इलाकों में पासपोर्ट सेवाएं पहुँचाने, आवेदकों को तेज और सुलभ सेवाएं प्रदान करने तथा बाधाओं के बावजूद प्रक्रियाओं में सुधार के उल्लेखनीय प्रयास किए हैं। उनके नवाचारों और सेवा समर्पण ने उन्हें यह प्रतिष्ठित सम्मान दिलाया।
अब जबकि वे केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय में निदेशक का पद संभाल रहे हैं, तो यह तय है कि वहां भी वे अपनी इसी ‘डाटा-संचालित’ और ‘मानवीय’ कार्यशैली से बड़े बदलाव लाएंगे।

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