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जलवायु परिवर्तन से उत्तराखंड में 2050 तक घट जाएंगे 70 फीसदी छोटे कृषि-वनीकरण क्षेत्र, अध्ययन में बड़ा खुलासा

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उत्तराखंड के कृषि वनीकरण पर दून विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं का अध्ययन, जलवायु परिवर्तन से छोटे कृषि-वनीकरण क्षेत्र घटने की आशंका, रिपोर्ट- रोहित सोनी

देहरादून: उत्तराखंड में कृषि-वनीकरण यानी पेड़ों, फसलों और जरूरत पड़ने पर पशुधन को एक साथ जोड़कर की जाने वाली खेती अब जलवायु परिवर्तन की वजह से प्रभावित हो रही है. एक नए अध्ययन के अनुसार, साल 2050 तक राज्य के छोटे और खंडित कृषि-वनीकरण क्षेत्रों में 60 से 70 फीसदी तक कमी आ सकती है. जबकि, बड़े कृषि-वनीकरण क्षेत्र भी 10 से 20 फीसदी तक घटने का अनुमान है.

दरअसल, दून विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने उत्तराखंड के कृषि वनीकरण पर अध्ययन किया है, जिसमें महत्वपूर्ण तथ्य निकलकर सामने आए हैं. अध्ययन के मुताबिक, उत्तराखंड में मौजूदा कृषि-वनीकरण प्रणालियां कुल 1,331.66 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली हैं. आखिर क्या है प्रदेश में कृषि वनीकरण की स्थिति, जलवायु परिवर्तन किस तरह से इसे कर रही है प्रभावित? विस्तार से आपको बताते हैं.

दून विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं की ओर से किए गए अध्ययन में मध्य ऊंचाई वाले क्षेत्रों और वर्षा-आधारित कृषि को सबसे ज्यादा संवेदनशील बताया गया है. ये अध्ययन रिपोर्ट ‘Assessing spatial suitability and climate resilience of agroforestry systems in the Indian Himalaya of Uttarakhand using remote sensing and artificial neural networks’ नाम से डिस्कवर फॉरेस्ट्स (Discover Forests) में 18 सितंबर 2026 को प्रकाशित हुई है.

इस रिपोर्ट को दून विश्वविद्यालय के दीपक कुमार मिश्रा, उज्ज्वल कुमार, कुसुम अरुणाचलम और आईसीएआर-केंद्रीय कृषि वानिकी अनुसंधान संस्थान झांसी के अय्यनादर अरुणाचलम ने तैयार किया है. अध्ययन में सैटेलाइट इमेजरी, जीआईएस, भूमि उपयुक्तता विश्लेषण (Land Suitability Analysis) और आर्टिफिशियल न्यूरल नेटवर्क का इस्तेमाल किया गया.

उत्तराखंड में कृषि-वनीकरण पद्धति की स्थिति: अध्ययन के मुताबिक, उत्तराखंड में मौजूदा कृषि-वनीकरण पद्धति कुल 1,331.66 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली हैं. इनका सबसे बड़ा हिस्सा 1,100 से 1,600 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में है. जहां कृषि-वनीकरण का क्षेत्रफल 489.46 वर्ग किमी पाया गया.

इसके साथ ही 1,600 से 2,100 मीटर ऊंचाई वाले क्षेत्रों में 290.30 वर्ग किमी, 600 मीटर से कम ऊंचाई वाले क्षेत्रों में 273.05 वर्ग किमी पाया गया है. खास बात ये है कि 1,331.66 वर्ग किमी का कृषि-वनीकरण क्षेत्र में से 405.46 वर्ग किमी क्षेत्र 20–30 डिग्री स्लोप, 325.78 वर्ग किमी क्षेत्र 10 डिग्री से कम स्लोप और 257.35 वर्ग किमी क्षेत्र 10–20 डिग्री स्लोप पर है.

अध्ययन के दौरान शोधकर्ताओं ने राज्य में कृषि-वनीकरण के विस्तार के लिए करीब 7,117 वर्ग किलोमीटर संभावित भूमि चिह्नित की है. जिसमें बंजर भूमि 4,013.15 वर्ग किमी, क्षरित वन (Degraded Forests) 2,072.24 वर्ग किमी, परती भूमि 1,031.92 वर्ग किमी है. इन क्षेत्रों में सहायक प्राकृतिक पुनर्जनन, मिट्टी संरक्षण और पेड़ आधारित खेती के जरिए भूमि बहाली (Land Restoration) की जा सकती है. अध्ययन के दौरान वर्तमान समय में सिर्फ 150.71 वर्ग किमी भूमि अत्यधिक उपयुक्त पाया गया है.

तीन श्रेणियों में बांटकर कृषि-वनीकरण भूमि का अध्ययन: दरअसल, शोधकर्ताओं ने भूमि मूल्यांकन मानकों और जीआईएस आधारित वेटेड ओवरले पद्धति से किए गए आकलन में कृषि-वनीकरण भूमि को तीन श्रेणियों में बांटा गया है. जिसके तहत अत्यधिक उपयुक्त श्रेणी में 150.71 वर्ग किमी, मध्यम रूप से उपयुक्त श्रेणी 525.33 वर्ग किमी और कम उपयुक्त श्रेणी 607.22 वर्ग किमी क्षेत्र को रखा है.

कृषि-वनीकरण की उपयुक्तता को तय करने के लिए इन मानकों का किया गया इस्तेमाल: इसके साथ ही कृषि-वनीकरण की उपयुक्तता (Suitability) तय करने के लिए सात प्रमुख मानकों का इस्तेमाल किया है. जिसमें ऊंचाई, ढाल, दिशा, औसत वार्षिक तापमान, औसत वार्षिक वर्षा, मिट्टी की गहराई और उपलब्ध भूमि शामिल है.

अध्ययन से पता चला कि राज्य में कृषि-वनीकरण का फैलाव मुख्य रूप से ऊंचाई, ढाल, वनस्पति की स्थिति और भौगोलिक क्षेत्रफल से प्रभावित होता है. आर्टिफिशियल न्यूरल नेटवर्क मॉडल में ढलान और भौगोलिक क्षेत्रफल सबसे प्रभावशाली वजह सामने आए. क्षेत्रीय सर्वेक्षण के दौरान, उत्तराखंड की कृषि-वनीकरण प्रक्रिया में 105 बहुउद्देश्यीय पेड़ प्रजातियां और 82 कृषि फसल प्रजातियां दर्ज की गईं. इसके अलावा 60 औषधीय पौधों की प्रजातियां भी दर्ज की गईं.

क्षेत्रीय सर्वेक्षण में पेड़, फसल और औषधीय पौधों को किया गया शामिल: कृषि-वनीकरण में गेहूं, धान, मक्का, उड़द, अरहर, पत्तागोभी, पालक, मंडुआ, सांवा, हल्दी और अदरक जैसी फसलें शामिल हैं. जबकि, पेड़ प्रजातियां, स्थानीय लोगों की ईंधन, चारा, फल, लकड़ी और औषधीय जरूरतों को पूरा करती हैं. भीमल (Grewia Optiva) और शहतूत (Morus alba) को चारा के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है.

बांज (Quercus Spp) और चीड़ (Pinus Roxburghii) में पेड़ का इस्तेमाल ईंधन और लकड़ी के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है. खुबानी (Prunus Armeniaca) और बेर (Ziziphus Mauritiana) का इस्तेमाल फल के लिए किया जा रहा है. इसी तरह बहेड़ा (Terminalia Bellirica) और बेल (Aegle marmelos) का इस्तेमाल औषधीय रूप में किया जा रहा है.

छोटे खेत जलवायु संकट के प्रति ज्यादा संवेदनशील: अध्ययन में छोटे खेत जलवायु संकट के प्रति ज्यादा संवेदनशील पाए गए हैं. आरसीपी (Representative Concentration Pathway) यानी जलवायु परिवर्तनों के आधार पर साल 2050 के लिए किए गए मॉडलिंग में कृषि-वनीकरण सिस्टम पर तापमान बढ़ने और वर्षा में बदलाव के प्रभावों का आकलन किया गया. जिसमें पाया गया कि 5 वर्ग किमी से छोटे कृषि-वनीकरण क्षेत्र 60-70 फीसदी तक कमी आ सकती है. जबकि 15 वर्ग किमी से बड़े क्षेत्र में 10-20 फीसदी तक की कमी आने का अनुमान है.

इन इलाकों पर पड़ेगा जलवायु परिवर्तन का सबसे ज्यादा असर: जलवायु परिवर्तन के सबसे ज्यादा असर मध्य ऊंचाई वाले और वर्षा-आधारित क्षेत्रों में पड़ने की संभावना है. लिहाजा, छोटे और खंडित क्षेत्रों में नमी का तनाव, वाष्पीकरण और मौसम की घटनाओं का असर काफी ज्यादा होगा.

अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक, बड़े क्षेत्र ज्यादा टिकाऊ रह सकते हैं. क्योंकि, उनमें जैविक और पारिस्थितिक सुरक्षा क्षमता ज्यादा होती है. जबकि, छोटे और अलग-अलग बिखरे खेतों में पेड़, फसल और मिट्टी के बीच संतुलन बनाए रखना कठिन होता है.

वहीं, ईटीवी भारत से बातचीत में दून विश्वविद्यालय की प्रो. कुसुम अरुणाचलम ने बताया कि, कृषि-वनीकरण उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में सिर्फ खेती की तकनीक नहीं, बल्कि आजीविका और पर्यावरण सुरक्षा का महत्वपूर्ण आधार है. पेड़ मिट्टी के कटाव को रोकते हैं. ढलानों को स्थिर बनाते हैं. खेतों में जैविक पदार्थ बढ़ाते हैं और स्थानीय लोगों को चारा, ईंधन, फल, लकड़ी एवं औषधीय संसाधन उपलब्ध कराते हैं.

“अध्ययन के दौरान पाया गया कि उत्तराखंड में कृषि-वनीकरण विस्तार के लिए करीब 7,117 वर्ग किमी भूमि उपलब्ध हो सकती है, लेकिन मौजूदा सिस्टम जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील हैं. खासकर छोटे, खंडित और वर्षा-आधारित कृषि-वनीकरण क्षेत्रों पर 2050 तक बड़ा संकट आ सकता है. इसलिए मध्य ऊंचाई वाले क्षेत्रों में स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप प्रजातियों का चयन, मिट्टी-पानी संरक्षण और सामुदायिक भागीदारी को प्राथमिकता देना जरूरी है.“- प्रो. कुसुम अरुणाचलम, दून विश्वविद्यालय

प्रोफेसर कुसुम अरुणाचलम ने कहा कि, इस अध्ययन में मार्केट तक पहुंच, भूमि स्वामित्व, किसानों की आय, सामुदायिक भागीदारी और कृषि-वनीकरण अपनाने की इच्छा जैसे सामाजिक-आर्थिक कारकों को सीधे शामिल नहीं किया गया. लिहाजा, भविष्य में होने वाले अध्ययनों में ड्रोन इमेजरी, जलवायु परिवर्तन मॉडलों और सामाजिक-आर्थिक आंकड़ों को शामिल करने की जरूरी है.

जलवायु अनुकूल कृषि-वनीकरण के लिए दिए सुझाव: शोधकर्ताओं ने अध्ययन के आधार पर जलवायु अनुकूल कृषि-वनीकरण के लिए तमाम सुझाव भी दिए हैं. जिसमें सूखा और गर्मी सहने वाली पेड़ प्रजातियों का चयन, वर्षा जल संचयन और मिट्टी-नमी संरक्षण, ढलानों पर कंटूर आधारित खेती एवं संरक्षण संरचनाएं, पेड़ों की बहुस्तरीय छतरी विकसित करना शामिल है.

इसके अलावा क्षरीत वन और कृषि भूमि के बीच के क्षेत्रों को रिवाइव करना, स्थानीय समुदायों की भागीदारी से कृषि-वनीकरण कार्यक्रम चलाना, कृषि-वनीकरण को जलागम प्रबंधन, जिला वन योजनाओं और जलवायु अनुकूल कृषि कार्यक्रमों से जोड़ना चाहिए. जिसके जरिए जलवायु के अनुकूल कृषि-वनीकरण को बढ़ावा दिया जा सकता है.

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