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ऋषिकेश से कर्णप्रयाग तक एनएच का रियलिटी चेक, ऑल वेदर रोड से विंटर टूरिज्म बन रहा है ‘गेम चेंजर’

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उत्तराखंड में शीतकालीन यात्रा की तैयारियां शुरू हो रही हैं. ईटीवी भारत ने ऋषिकेश से कर्णप्रयाग तक सड़क मार्ग का जायजा लिया. रिपोर्ट- धीरज सजवाण

देहरादून/ऋषिकेश/रुद्रप्रयाग: उत्तराखंड में इस साल की चारधाम यात्रा अब समाप्ति की ओर है. इसके साथ ही, शीतकालीन यात्रा और सर्दियों में पर्यटन को बढ़ावा देने की तैयारियां शुरू हो गई हैं. ऐसे में चारधाम यात्रा के प्रमुख प्रवेश मार्ग ऋषिकेश से लेकर देवप्रयाग, श्रीनगर, रुद्रप्रयाग और कर्णप्रयाग तक सड़कों की स्थिति कैसी है? मॉनसून के दौरान हुए नुकसान के बाद कितनी मरम्मत हुई है और ऑल वेदर रोड परियोजना का असर धरातल पर कितना दिखाई दे रहा है? यह जानने के लिए ETV Bharat की टीम ने सड़क मार्ग से सफर कर हालात का जायजा लिया.

देहरादून से अपने सफर की शुरुआत करते हुए हमारी टीम आगे बढ़ी. ज्यादातर हिस्सों में यातायात सामान्य मिला और सड़क पर आवाजाही में बड़ी परेशानी नहीं दिखी. हालांकि, श्रीनगर से आगे फरासू के पास पहाड़ी के उपचार और सड़क सुधार का काम जारी मिला. यहां वाहनों को नियंत्रित तरीके से आगे बढ़ाया जा रहा था. इस सफर में सड़क की स्थिति के साथ-साथ स्थानीय कारोबारियों की उम्मीदें भी सामने आईं. व्यापारियों का कहना है कि, अब चारधाम यात्रा का मुख्य सीजन समाप्त होने के बाद भी पर्यटन और धार्मिक गतिविधियों के कारण कारोबार पूरी तरह बंद नहीं होता.

ऋषिकेश से शुरू होता है पहाड़ का सफर, ऑफ-सीजन में भी बनी रहती है आवाजाही: ऋषिकेश को उत्तराखंड के चारों धाम बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री का प्रमुख प्रवेश द्वार माना जाता है. यहीं से पहाड़ी जिलों और सीमांत क्षेत्रों की ओर जाने वाले प्रमुख मार्ग आगे बढ़ते हैं. चारधाम यात्रा के मुख्य सीजन में यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक पहुंचते हैं. मॉनसून के बाद यात्रा का स्वरूप बदल जाता है और अब सर्दियों की यात्रा और पर्यटन गतिविधियों पर नजर रहती है.

ऋषिकेश में ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान स्थानीय रोजगार से जुड़े लोगों से बातचीत में सामने आया कि मौसम बदलने के साथ उनके कारोबार पर भी असर पड़ता है. गन्ने का रस और मूंगफली का ठेला लगाकर परिवार चलाने वाले प्रेम सिंह यादव ने बताया कि,

नवंबर से फरवरी के बीच सर्दियों में काम थोड़ा हल्का हो जाता है. लेकिन पिछले 8 से 10 सालों में ऑफ-सीजन का स्वरूप बदला है. शीतकालीन यात्रा को बढ़ावा मिलने से मुख्य यात्रा सीजन के बाद भी श्रद्धालुओं और पर्यटकों की आवाजाही बनी रहती है. इससे छोटे कारोबारियों को कुछ सहारा मिलता है.
– प्रेम सिंह यादव, स्ट्रीट वेंडर –

ऋषिकेश से आगे बढ़ने पर सड़क मार्ग पहाड़ी क्षेत्र में प्रवेश करता है. नरेंद्रनगर की ओर जाने वाला रास्ता उत्तरकाशी, गंगोत्री और यमुनोत्री की दिशा में जाता है, जबकि देवप्रयाग और श्रीनगर होते हुए आगे बढ़ने वाला मार्ग अलकनंदा और मंदाकिनी घाटियों को जोड़ता है. इसी मार्ग से केदारनाथ और बदरीनाथ की ओर जाने वाले यात्रियों की आवाजाही होती है.

ईटीवी भारत की टीम ने ऋषिकेश से देवप्रयाग तक सड़क की स्थिति का जायजा लिया. इस हिस्से में सफर सामान्य रहा. सड़क पर बड़े गड्ढे या भारी भूस्खलन से रास्ता बाधित होने जैसी स्थिति नजर नहीं आई और यातायात सुचारू मिला.

देवप्रयाग में संगम पर श्रद्धालु, कारोबारियों को सर्दियों में भी उम्मीद: ऋषिकेश से आगे बढ़ने पर ईटीवी भारत की टीम देवप्रयाग पहुंची. पंच प्रयागों में शामिल देवप्रयाग में अलकनंदा और भागीरथी नदियों का संगम होता है. दोनों नदियों के मिलने के बाद गंगा आगे की यात्रा शुरू करती है. अक्टूबर के अंतिम दिनों में भी संगम तट पर श्रद्धालु और पर्यटक नजर आए. मॉनसून के बाद यहां लोगों की आवाजाही और स्थानीय कारोबार की स्थिति को समझने के लिए व्यापारियों से बातचीत की गई.

मुख्य यात्रा सीजन में धामों के आसपास कारोबार करने वाले लोगों को अच्छा काम मिलता है. लेकिन कपाट बंद होने के समय कई कारोबारी निचले इलाकों में लौट आते हैं. शीतकाल में मुख्य धामों पर भीड़ कम हो जाती है, फिर भी स्थानीय आवाजाही और पर्यटन से कारोबार चलता रहता है.
– आदित्य सिंह, स्थानीय युवा –

देवप्रयाग संगम के पास कारोबार करने वाले विनोद सिंह ने भी यात्रा सीजन और ऑफ-सीजन के बीच के अंतर को साझा किया. उन्होंने बताया, कपाट बंद होने के बाद कुछ समय के लिए यात्रियों की आवाजाही कम होती है, लेकिन इसके बाद सर्दियों में औली और चोपता जैसे पर्यटन स्थलों पर बर्फबारी देखने के लिए लोग पहुंचते हैं. वहीं, ऊखीमठ और जोशीमठ जैसे स्थानों पर शीतकालीन पूजा और धार्मिक गतिविधियों के कारण श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी रहती है.

अब सर्दियों में भी कुछ न कुछ कारोबार बना रहता है और इससे उन लोगों को राहत मिलती है, जिनकी आजीविका पर्यटन और तीर्थयात्रा पर निर्भर है. हालांकि, कारोबार की स्थिति हर स्थान पर एक जैसी नहीं रहती. पर्यटकों की संख्या, सड़क की स्थिति और स्थानीय सुविधाओं के आधार पर अलग-अलग बाजारों में इसका असर बदलता है.
– विनोद सिंह, व्यापारी देवप्रयाग –

फरासू में जारी है सड़क सुधार का काम: देवप्रयाग से श्रीनगर गढ़वाल की ओर बढ़ने पर सड़क पर सामान्य आवाजाही देखने को मिली. श्रीनगर को पार करने के बाद धारी देवी मंदिर से आगे फरासू के पास सड़क सुधार और पहाड़ी के उपचार का काम जारी मिला. मॉनसून के दौरान हुए भूस्खलन के बाद यहां ढलान को स्थिर करने यानी स्लोप स्टेबलाइजेशन का काम किया जा रहा है. इस दौरान पहाड़ी से ढीले पत्थरों और मलबे को हटाने और सड़क को सुरक्षित बनाने से जुड़े काम मौके पर दिखाई दिए. निर्माण कार्य के कारण वाहनों को एक साथ लगातार आगे बढ़ाने के बजाय नियंत्रित तरीके से छोड़ा जा रहा था. इससे यात्रियों को कुछ समय रुकना पड़ रहा था.

मौके पर जारी काम को देखते हुए साफ था कि इस हिस्से में सड़क सुधार का कार्य अभी पूरा नहीं हुआ है. निर्माण एजेंसियों के सामने चुनौती यह है कि पहाड़ी को सुरक्षित बनाने के साथ सड़क पर यातायात भी बनाए रखा जाए. गैरसैंण में विधानसभा सत्र के दौरान वाहनों की आवाजाही बढ़ने की संभावना को देखते हुए सड़क मार्ग पर काम और यातायात प्रबंधन भी अहम हो जाता है. हालांकि, इस स्थान पर काम कब तक पूरा होगा, इसकी आधिकारिक समयसीमा की पुष्टि अभी नहीं है.

शीतकालीन यात्रा से पहले ऐसे संवेदनशील स्थानों पर सड़क की स्थिति और सुरक्षा इंतजाम यात्रियों के लिए महत्वपूर्ण होंगे. ऑल वेदर रोड परियोजना का उद्देश्य पहाड़ी मार्गों पर आवागमन को बेहतर बनाना है, लेकिन फरासू जैसे स्थान यह भी दिखाते हैं कि भूस्खलन प्रभावित क्षेत्रों में लगातार सुधार और रखरखाव की जरूरत बनी रहती है.

रुद्रप्रयाग में सामान्य दिखी चहल-पहल, व्यापारियों को शीतकालीन पर्यटन से आस: फरासू से आगे बढ़ने के बाद ईटीवी भारत की टीम रुद्रप्रयाग मुख्य बाजार पहुंची. अलकनंदा और मंदाकिनी नदियों के संगम पर बसे इस शहर में मॉनसून के बाद सामान्य जनजीवन और बाजार की चहल-पहल दिखाई दी. यहां स्थानीय कारोबारियों से बातचीत में सामने आया कि मुख्य चारधाम यात्रा सीजन के बाद भी पर्यटन और धार्मिक गतिविधियां बाजार को सहारा देती हैं.

ऑफ-सीजन का मतलब यह नहीं कि कारोबार पूरी तरह ठप हो जाता है. चोपता, तुंगनाथ, देवरियाताल और कार्तिक स्वामी जैसे पर्यटन स्थलों पर पर्यटकों की आवाजाही बनी रहती है. इसके अलावा ऊखीमठ के ओंकारेश्वर मंदिर में भगवान केदारनाथ की शीतकालीन पूजा के कारण भी श्रद्धालु पहुंचते हैं. शीतकालीन यात्रा और पर्यटन को बढ़ावा देने की कोशिशों से स्थानीय होटल, लॉज और बाजार को लाभ मिलने की उम्मीद रहती है.
– राजेश नौटियाल, व्यापारी, रुद्रप्रयाग –

चारधाम यात्रा का सीधा फायदा मुख्य राजमार्ग पर स्थित होटलों, ढाबों और परिवहन व्यवसाय से जुड़े लोगों को मिलता है, जबकि शहर के अंदरूनी बाजार की कमाई स्थानीय निवासियों, शादियों के सीजन और रोजमर्रा की खरीदारी पर भी निर्भर करती है. यात्रा सीजन में बाजार में पैसों की आवाजाही बढ़ती है, जिसका असर अलग-अलग कारोबार पर पड़ता है.
-सुरेंद्र सिंह कपरवान, व्यापारी, रुद्रप्रयाग-

शीतकालीन यात्रा से पहले सड़क सुरक्षा और स्थानीय कारोबार, दोनों अहम: ऋषिकेश से कर्णप्रयाग तक ईटीवी भारत की ग्राउंड रिपोर्ट में दो प्रमुख पहलू सामने आए.

  1. पहला-मॉनसून के बाद इस मार्ग के अधिकांश हिस्सों में सफर सामान्य रहा और यातायात सुचारू दिखाई दिया.
  2. दूसरा-फरासू जैसे संवेदनशील स्थानों पर सड़क सुधार और पहाड़ी को स्थिर करने का काम अब भी जारी है. ऐसे स्थानों पर काम की प्रगति, सुरक्षा इंतजाम और यातायात प्रबंधन पर नजर रखना जरूरी है. खासकर तब जब सर्दियों में मौसम बदलने के साथ पहाड़ी सड़कों पर नई चुनौतियां सामने आ सकती हैं.

दूसरी ओर, देवप्रयाग और रुद्रप्रयाग के कारोबारियों की बातचीत से पता चलता है कि शीतकालीन यात्रा और पर्यटन को लेकर स्थानीय स्तर पर उम्मीदें बनी हुई हैं. मुख्य यात्रा सीजन के बाद पर्यटकों की संख्या कम हो सकती है, लेकिन शीतकालीन पूजा, बर्फबारी और दूसरे पर्यटन स्थलों की वजह से आवाजाही जारी रहने की संभावना रहती है.

हालांकि, इन उम्मीदों को स्थायी रोजगार और बेहतर आमदनी में बदलने के लिए सड़क सुरक्षा, पर्यटक सुविधाओं, स्थानीय प्रचार और कारोबार से जुड़े लोगों के लिए बेहतर व्यवस्था भी जरूरी है. मॉनसून के बाद यात्रा मार्ग की मौजूदा स्थिति और स्थानीय कारोबारियों की उम्मीदें यही संकेत देती हैं कि उत्तराखंड में पर्यटन का मौसम केवल कुछ महीनों तक सीमित न रहे, इसके लिए सड़क संपर्क और शीतकालीन पर्यटन की तैयारियों पर लगातार ध्यान देना होगा.

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